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एक खत शाहरूख के हेटर्स के नाम !!!!

 प्रिय हेटर्स, भले ही आप शाहरूख खान को नापसंद करते हो लेकिन हम जो शाहरूख को चाहते है मानते हमारे लिए आपकी  ये जो नफरत है शाहरूख के प्रित उससे फर्क नहीं पड़ता ...  सच कहूं तो शाहरूख को चाहना लाईफ की सबसे बड़ी कमयाबी लगती है , कभी कभी ये लगता है कि अगर  मैंने शाहरूख को ना चाहा होता तो बहुत बड़े और प्यारे एहसास से दूर रहता ...  शाहरूख की मुस्कान , वो दिल और दिमाग में बसने वाली आवाज़, और उनकी हाज़िर जवाबी ,हर चीज़ खास है . वो जहां जाते है ऐसा लगता है कि उनके साथ ही पूरी दुनिया रहती है .. इस बात का सबसे बड़ा सबूत ये है कि इतने साल बाद उनकी एक भी फिल्म न आने के बावजूद वो आए दिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते रहते है . वही आपकी नफरत हमेशा से बॉयकॉट के रूप में आती है .MY NAME IS KHAN  के बॉयकॉट से लेकर पठान के बॉयकट तक हम हमेशा किंग खान के साथ है और रहेंगे . बॉयकाट जैसा शब्द शाहरूख के सामने काफी छोटा है . आप अपनी नफरत से उसे और सींचो. आपकी नफरत का  RANGE  बहुत कम है हमारे प्यार के आगे ...  हम शाहरूख को सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर ही नहीं मानते बल्कि हम उन...

हिंदू मुस्लिम हैं तो मुद्दा भड़केगा !!!!

 हाल ही में उत्तराखंड में अंकिता हत्या कांड ने सभी को हिला कर रख दिया है.साथ ही देश को एक नया मुद्दा भी मिल गया है. लेकिन देखा जाए तो ये घटना और भी तूल पकड़ती अगर इसमें किसी मुस्लिम का नाम शामिल होता.  इस वक्त देश में सबसे ट्रैंडिंग विषय  है हिंदू -मुस्लिम ... खैर देश में दंगा भड़काने वालों के लिए इस केस में कुछ नहीं मिला .. नहीं तो अब तक जगह जगह अंकिता को इंसाफ दो, का शोर और भी तेजी के साथ होता . हर घटना को अब हम सही और गलत की दृष्टि से तो देखते ही नहीं है. हमारी आंखों पर तो सिर्फ धर्म को बचाने की नकली पट्टी बंधी हुई हैं.इसी को लगा कर हम हर मुद्दे को देखते है .जबकि देखा  जाए तो हम सही ढंग से अपने धर्म के हिसाब से भी नहीं चलते .इस धर्म की आंधी ने एक नया मुद्दा दिया है और वो ये है कि हमें  अपना धर्म खतरे में दिख रहा है. जबकि ऐसा कुछ है ही नही.  देखा जाएं तो दंगे की आड़ में जो अपने मुनाफे की रोटियां सेंक रहे है , वो हमारे दिमाग और सोच को चला रहे है. जिस वह से  हम हिंदू और मुस्लिम की बात पर फौरन आग बबूला हो जाते है.  "मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रख...

कुछ करना है तो मेहमान बनो

घर का सबसे खास मेहमान कौन होता है ? ये प्रश्न सुनते ही आपके दिमाग में जिन लोगों का नाम आया होगा .उसकी जगह आप अपना ही नाम लीजिए.क्योंकि घर के सबसे खास मेहमान तो हम ही होते हैं. जिसके आने से  हमारे माता पिता के चेहरे खिल जाते है.सालों या महीनों से भले ही घर में अच्छी चीज़ न बनी हो ,पर हमारे आते ही हमारी मां किचन में वो सब बनाने लगती हैं जो हमें पसंद हो .   ऐसे  मेेहमानो के आने पर रौनक आमतौर पर बड़े त्यौहारों पर देखने को मिलती है. गांव की ओर जाने वाली बसों में  ऐसे ही खास मेहमान बैठे होते है ,जिनके आते ही घर की रौनक दोगुनी हो जाती है. भले ही वो रौनक दो चार दिन की ही क्यों न हो.देखा जाए तो अपने ही घर में मेहमान हम खुद ही बनते हैं.और ये रास्ता हम खुद ही चुनते है .पर क्यों ? इसका  जवाब है एक बेहतर  जिंदगी के लिए .अच्छी पढ़ाई ,अधिक पैसे वाली नौकरी के लिए. पर इसके लिए जो कीमत चुकानी होती है वो बहुत ही बड़ी होती है .  वैसे देखा जाए तो ऐसे खास मेहमान के आने और घर में रूकने के दिन भी वक्त के साथ बदलते है.उदाहरण के तौर पर जब कॉलेज का पहला -दूसरा साल होता है त...

किसी को आदत बनाना गलत हैं या नहीं ?

 हम सभी की  ज़िंदगी में कई ऐसे लोग होते है ,जिनके साथ समय बिताना हमें बहुत अच्छा लगता हैं .और ऐसे लोग हमारी ज़िंदगी में कुछ ही लोग होते हैं.उदाहरण के तौर पर चाहे शॉपिंग पर जाना हो या किसी रेस्टोरेंट में खान हम हर किसी के भी साथ नहीं जाते.वो कुछ लोग ही होते हैं.और वो कुछ लोग कोई भी हो सकता हैं.हो सकता हैं कि वो आपका सबसे अच्छा दोस्त हो.आपका कोई कज़न हो, या आपके माता पिता . रोज़ की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में  सुकून के पल हम ऐसे ही किसी के साथ बिताते हैं.जो हफ्ते भर की चिंता में हमें सुकून पहुंचा सकें.देखा जाएं तो पूरे हफ्ते भर की टेंशन और भागदौड़ में हम ऐसे इंसान को चुनते हैं जो हमारे टेंशन को कम कर सके.  .और जब ये सिलसला चलता ही रहता हैं तो ये हमारी आदत बन जाता हैं.पर सवाल ये हैं कि जब वही इंसान जिसे हम अपना स्ट्रैस बस्टर (stress buster) समझते हैं यानी हमारी चिंता हरने वाला ,वही अगर हमसे पीछा छुड़ाने वाला बन जाएं तो,और देखा जाएं तो ऐसा दौर लगभग सबके जीवन में आता हैं.  और यहीं से हमारे दिमाग का कीमा बनता हैं. मतलब ये कि ,हम तो उसे अपनी आदत बना लेते हैं. पर वो आदत हमस...

देश की सेवा करने वालों को मिला 4 साल के लिए लॉलीपॉप

कहते हैं कि काम छोटा या बड़ा नहीं  होता हैं, हर काम की अहमियत होती हैं. टीचर, डॉक्टर ,मैकेनिक ,दर्जी, आया, आदि.जो भी व्यक्ति काम करता हैं उसकी अहमियत होती हैं. लेकिन शायद किसी पेश में मरना नहीं लिखा होता हैं. पर एक सिपाही ,एक आर्मी ऐसा पेशा है कि उसमें आपको अपनी जान भी समर्पित करनी होती हैं..... इसलिए इसमें हर कोई नहीं जाना चाहता ,और जो भी ये पेशा चुनता हैं तो समझ जाइएं कि उसका  जिगरा आपसे बड़ा हैं  जनाब. इसलिए जब कोई आर्मी में जाने का फैसला करता हैं तो वो अपना दिल,दिमाग और अपना शरीर पूरी तरह से समर्पित करता हैं.देखा जाएं तो ये सेना में जाने से पहले ही वीर हो जाते हैं, क्योंकि इन्होंने पहले से ही कुर्बान होने का निर्णय ले लिया है.  और यही कारण हैं कि उनके गुस्से से आज पूरा देश धदक रहा हैं. सरकार ने इन वीर जवानों को चार साल का लॉलीपॉप दिया हैं . चार साल के लिए ये अपना तन मन कुर्बान करें और फिर उसके बाद टाटा बाए-बाए. सरकार ने भी महंगा गिफ्ट दिया , एक तो कई साल से भर्तियां नहीं निकल रही थी. और अब निकली भी तो मात्र चार साल के लिए .वाह ! एक बार आप खुद सोचिए कि क्या सेना क...

इको फ्रैंडली पटाखे

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हर साल दीपावली के मौके पर हम सब से सुनते है कि इको फ्रैंडली दीपावली मनाईए,पटाखो का इस्तेमाल न करिए... पर देखा जाए तो ,बगैर पटाखो के दीपवली की रौनक थोड़ी फिकी लगती है...लेकिन इस रौनक से भी ज़्यादा ज़रुरी है ,अपने पर्यवरण की सुरक्षा... और इसलिए अगर हम कैमिकल वाले पटाखो के बजाए इको फ्रैंडली पटाखो को जलाए तो दीपावली की रौनक में चार-चॉंद लग जाएगा... और इसी बात को मैंंने एक विज्ञापन के ज़रिए समझाने का प्रयास किया है...जिसमें खुशी और सुरक्षा एक साथ है...    Listen to the most recent episode of my podcast: Eco friendly crakers   https://anchor.fm/nikita- prajapati/episodes/Eco- friendly-crakers-emq2oa Reply Forward

ये कल्चर है अपनी संस्कृति को भुलाना...

आज के इस दौर में अंग्रेज़ी भाषा कितनी महत्वपूर्ण है, ये हम सब बखूबी जानते है ...देश का आर्थिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक हर तरफ सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा का ही बोलबाला है ... और अब तो लोगों की ये मानसिकता भी बन गई कि इंग्लिश आती है तो भाई तुम पढ़े लिखे हो और समाज के ऊंचे तबके से तालुक रखते हो ... सच में हिंदी अपनी भाषा हो कर भी हमारी नहीं है ... और हिंदी को खुद से दूर करने का पूरा श्रेय हम सब देशवासियों को ही जाता है ...उसका साधी उदाहरण कई जगह देखने को मिलता है जैसे कि हमारे देश में ज़्यादातर दुकानों के नाम अंग्रेज़ी में लिखे होते है ...नौकरी के लिए साक्षात्कार (इंटरव्यू) भी अंग्रेज़ी भाषा में ही होता है जैसे किसी विदेशी कपंनी हो ...इसी के साथ ही हमारे देश के जितने भी चर्चित चेहरे है खासकर सिनेमा जगत के सितारे ये सब इंग्लिश में ही अपने इंटरव्यू देते है ...इतना ही नहीं हम दूर न जाकर खुद को ही देखे तो हम में से कुछ ही लोगों होगे जिन्हें हिंदी गिनती आती हो...यहां तक कि अगर चार लोगों के बीच अगर हम हिंदी के बजाए अंग्रेज़ी में बोलते है तो खुद पर गर्वान्वित महसूस करते है ... और देखा जाए तो ...