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Showing posts from 2020

इको फ्रैंडली पटाखे

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हर साल दीपावली के मौके पर हम सब से सुनते है कि इको फ्रैंडली दीपावली मनाईए,पटाखो का इस्तेमाल न करिए... पर देखा जाए तो ,बगैर पटाखो के दीपवली की रौनक थोड़ी फिकी लगती है...लेकिन इस रौनक से भी ज़्यादा ज़रुरी है ,अपने पर्यवरण की सुरक्षा... और इसलिए अगर हम कैमिकल वाले पटाखो के बजाए इको फ्रैंडली पटाखो को जलाए तो दीपावली की रौनक में चार-चॉंद लग जाएगा... और इसी बात को मैंंने एक विज्ञापन के ज़रिए समझाने का प्रयास किया है...जिसमें खुशी और सुरक्षा एक साथ है...    Listen to the most recent episode of my podcast: Eco friendly crakers   https://anchor.fm/nikita- prajapati/episodes/Eco- friendly-crakers-emq2oa Reply Forward

ये कल्चर है अपनी संस्कृति को भुलाना...

आज के इस दौर में अंग्रेज़ी भाषा कितनी महत्वपूर्ण है, ये हम सब बखूबी जानते है ...देश का आर्थिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक हर तरफ सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा का ही बोलबाला है ... और अब तो लोगों की ये मानसिकता भी बन गई कि इंग्लिश आती है तो भाई तुम पढ़े लिखे हो और समाज के ऊंचे तबके से तालुक रखते हो ... सच में हिंदी अपनी भाषा हो कर भी हमारी नहीं है ... और हिंदी को खुद से दूर करने का पूरा श्रेय हम सब देशवासियों को ही जाता है ...उसका साधी उदाहरण कई जगह देखने को मिलता है जैसे कि हमारे देश में ज़्यादातर दुकानों के नाम अंग्रेज़ी में लिखे होते है ...नौकरी के लिए साक्षात्कार (इंटरव्यू) भी अंग्रेज़ी भाषा में ही होता है जैसे किसी विदेशी कपंनी हो ...इसी के साथ ही हमारे देश के जितने भी चर्चित चेहरे है खासकर सिनेमा जगत के सितारे ये सब इंग्लिश में ही अपने इंटरव्यू देते है ...इतना ही नहीं हम दूर न जाकर खुद को ही देखे तो हम में से कुछ ही लोगों होगे जिन्हें हिंदी गिनती आती हो...यहां तक कि अगर चार लोगों के बीच अगर हम हिंदी के बजाए अंग्रेज़ी में बोलते है तो खुद पर गर्वान्वित महसूस करते है ... और देखा जाए तो ...

कारोना ने हम सबको क्या सिखाया...

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कोरोना ने हम सबको क्या सिखाया... कहते है कि बुरे के पीछे भी कुछ भला होता है .. कोरोना नाम की इस त्रासदी ने भी कुछ ऐसा ही किया है .. इस महामारी ने अच्छे अच्छों को सबक  सिखा दिया है .. तो वो अच्छे चमत्कार क्या हुए ज़रा डालते है एक नज़र- लोगो को अपनों से जोड़ा- अक्सर कर जब हम अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते है तो हम अपनों को भूल जाते है ...जब भी घरवाले बुलाते है हम कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देते है .. और अब देखिए इस कोरोना ने सबको अपने घर के रास्ते पहूंचा दिया... सभी को ज़िदगी जो प्यारी है... इस कोरोना ने घर  से रुठों को भी अपने असली घर का पता बता दिया जो वो खोए बैठे थे ...  पैसे नहीं खाने की कीमत का एहसास कराया- जैसे ही सर - कार ने यातायात के साधन और काम को ठप्प करवाया वैसे ही सभी को  इस बात का एहसास करा दिया गया कि भाई पैसों से हड़कर पेट होता है ..और जो भी काम के वजह से अपने गांवो को छोड़कर गए थे उन सबकों अपने गांव की ओर फिर लौटना पड़ा... और सभी ने हज़ारों किलोमीटर का फासला तय कर अपने गांव का रुख किया ...   अपने देश की कद्र करन...

क्या शादी के लिए समान जाति और धर्म ज़रुरी है ?

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क्या शादी के लिए समान जाति और धर्म  ज़रुरी  है  ?  भारत देश की जब भी बात आती है तो उसे एकता में विभिन्नता का देश माना जाता है  , क्योंकि यहां की बोली ,भाषा, धर्म  और मौसम हर चीज़ में विभिन्नता पाई जाती है ...लेकिन जब बात शादी की आए तो ये एकता कही खो जाती है ...और ऐसा इसलिए और होता है  क्योंकि हमारे देश में  विभिन्न प्रकार के धर्म के साथ ही अनेक तरह की जातियां भी है शामिल है ,जो लोगों को एक होने नहीं देती...                                          पर क्या सच में विवाह के लिए ये सब मायने रखता है ... मेरे ख्याल से नहीं, क्योंकि जो भी हो पर अन्त में हमारा व्यवहार ही मायने रखता है ...उदाहरण के तौर पर जब किसी की शादी होती है तो उसके कुछ दिन बात ही घरवालों के बीच अलगाव की रेखा खिंच जाती है ... और सच यही है कि आपका अपना स्वभाव ही महत्तवपूर्ण होता है ...  देखा जाए तो भारत देश में इसी वजह से कई युवा आत्महत्या या घर से भाग जाने का र...

एक बाज़ार ऐसा जहां बिकती है दुल्हने

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एक बाज़ार ऐसा जहां बिकती है दुल्हने .... दुनिया  के हर माता -पिता का सपना होता है अपने बच्चों की शादी करना ...और वही  अगर बेटी की शादी की बात हो तो वो और भी महत्तवपुर्ण हो जाती है ... लेकिन आपको ये जानकर काफी हैरानी होगी कि  बुल्गारिया देश में एक ऐसा भी समाज है जहां लड़कियों की शादी करने के लिए पहले उन्हें बेचा जाता है...  दरअसल बुल्गारिया देश में एक रोमा नाम का सामाज हैं, जिसमें कालदाज़ी नाम की एक पिछड़ी जाती है....पेशे से इस जाति के लोग लौहार का काम करते है ...और इनकी आर्थिक स्थिति भी इतनी अच्छी  नहीं होती हैं....और इसलिए इनके यहां शादी एक आर्थिक रुप से  लाभान्वित माना जाता हैं ... इस जाति में लड़कियों की शादी के लिए उन्हें सबसे पहले दुल्हन बाज़ार में बेचा जाता है ...और इस बाज़ार का आयोजन हर चार साल में किया जाता है ... इस बाज़ार मे ंकुवांरी लड़किया हिस्सा लेती है ,जिनकी उम्र 16 या उससे अधिक होती है ... वैसे ज़्यादातर लोग कम उम्र की ही लड़कियों को खरीदते है ... इस रुढ़ीवाद ईसाई समाज मे ंलड़कियों को  ज़्यादा पढ़ने की इजा...

भक्ति में डर का एहसास

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    भक्ति में डर का एहसास ..... कभी कभी मैं सोचती हूं की   हम अपने भगवान या अल्लाह की पूजा कैसे करते है, डर से या मन से .... अगर ये सवाल मैं किसी से पूछू तो ज्यादातर लोग   यही कहेगे कि हम तो मन से करते है... पर देखा जाए तो उनकी ये आराधना डर से ही होगी ... बहरहाल ,अल्लाह का शुक्रियाअदा करने के लिए खौफ की ज़रुरत नहीं होती उसी तरह   व्रत भी डर के साथ नही अपनी इच्छा के साथ रखना चाहिए... और ये डर किसी और ने नहीं हम सब ने ही इसे बढ़ावा दिया है ,उदाहरण के तौर पर - जब कुछ बुरा होता  है   तो हम कहते है कि भगवान की मर्ज़ी होगी और अगर कुछ अच्छा हो तो उसे भगवान  का चमत्कार कहते है .... यानी हमारे जीवन में जब भी  कुछ   घटित होता है उसका ज़िम्मेदार हम ईश्वर को ही मानते है  , पर देखा जाए तो  इन सबके पीछे   हमारे कर्म भी ज़िम्मेदार होते है ...और ये हम सभी के धर्म ग्रंधों में भी लिखा है कि ईश्वर कभी हमें ये नहीं कहते उन्हें बिना मन के या ज़बरदस्ती याद किया जाए.. और यही नहीं   ...

हम नहीं सुधरेगे

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     https://youtu.be/wvCPmJVN6no इन दिनों हमारे देश में  सफाई  को लेकर कई कदम उठाए जा रहें है... शहरों से लेकर गांव  तक कई तरह के जागरुकता अभियान  भी चलाए रहे है ... और  इस सफाई अभियान में एक कदम है खुले में शौच , और  इसके लिए तो सरकार ने भी शौचालय की व्सवसथा की है ...पर हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी लोगों को ये बात समझ में नहीं आती...  और वो महान व्यकित है  जो कही भी हल्के जो जाते है ... जिन्हे सार्वजनिक शौचालय के बजाए रोड़ ,गलियां या कोई कोना ज़रुर दिख जाता है टॉयलट  करने के लिए ....  यानी दो रुपए खर्च ना करना पड़े , बस ...और रही बात शर्म की, तो  इससे इनका दूर -दूर तक कोई नाता नहीं है ... और ऐसा नही है कि ये हरकत सिर्फ अनपड़ ही करते है , ब्लकि एक से एक  पडेे़ लिखे लोग भी  बड़ी आसानी से हल्के हो जाते है ...  बहरहाल  इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता , पर जो भी ऐसी जगह से होकर गुज़रता है उसे बेहद गंदी बदबू का सामना करना पड़ता है ... मतलब ये तो वही हो गया कि  करे कोई और भुगते कोई और.... ...

सिनेमा में मोहब्बत का बदलता रंग.....

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सिनेमा में मोहब्बत का बदलता रंग.....        यूं तो भारतीय सिनेमा में हमें इमोशन के हर पहलू देखने को मिलते है , मैलो ड्रामा से लेकर प्यार ,दोस्ती और चोर पुलिस की भागा- दौड़ी तक...और यहां तक की अब तो हम फिक्शन से अलग बायोपिक पर भी आ गए है ... और सिनेमा प्रेमियों ने फिल्मों के इस बदलते रंग को अपनाया भी हैं ...पर अगर हम लवस्टोरी की बात करें तो मुझे मोहब्बत का ये बदला हुआ रंग कुछ हज़म नहीं हुआ... अगर मैं पहले और अब के दौर की बात करुं तो , पहले  की फिल्मों में ,प्यार एक ज्ज़बात हुआ करता था.. वही अब का प्यार केवल दिखावा है या फिर यूं कहे की   अब की फिल्मों में मोहब्बत को सिर्फ शारीरिक सबंध के ज़रिए ही पेश किया जाता है ... देखा जाए तो अब की फिल्मों में प्यार को  बगैर इनटेमेट सीन के दिखाया ही नहीं जाता ... फिल्मस् के मेकर्स को लगता है कि आज की जनता बस यही देखना चाहती है... और इसीलिए आज की पीढ़ी में भी मोहब्बत का वही नया रंग घुलता दिख रहा है... पर मेरा मानना है कि  , फिल्म में कहानी  नाम की भी कोई चीज़ होती है ...इंटेमे...