भक्ति में डर का एहसास


  भक्ति में डर का एहसास.....

कभी कभी मैं सोचती हूं की  हम अपने भगवान या अल्लाह की पूजा कैसे करते है, डर से या मन से .... अगर ये सवाल मैं किसी से पूछू तो ज्यादातर लोग  यही कहेगे कि हम तो मन से करते है... पर देखा जाए तो उनकी ये आराधना डर से ही होगी ...
बहरहाल ,अल्लाह का शुक्रियाअदा करने के लिए खौफ की ज़रुरत नहीं होती उसी तरह  व्रत भी डर के साथ नही अपनी इच्छा के साथ रखना चाहिए...
और ये डर किसी और ने नहीं हम सब ने ही इसे बढ़ावा दिया है ,उदाहरण के तौर पर -



जब कुछ बुरा होता है तो हम कहते है कि भगवान की मर्ज़ी होगी और अगर कुछ अच्छा हो तो उसे भगवान का चमत्कार कहते है ....यानी हमारे जीवन में जब भी कुछ घटित होता है उसका ज़िम्मेदार हम ईश्वर को ही मानते है ,पर देखा जाए तो इन सबके पीछे हमारे कर्म भी ज़िम्मेदार होते है ...और ये हम सभी के धर्म ग्रंधों में भी लिखा है कि ईश्वर कभी हमें ये नहीं कहते उन्हें बिना मन के या ज़बरदस्ती याद किया जाए..

और यही नहीं  जब हम उन्हें अपनी विश-लिस्ट देते है तो साथ –साथ उन्हें रिशवत से भरा पैकेज भी देते हैं ...उदाहरण के तौर पर नौकरी लगने पर चांदी का छतर या फिर मज़ार में महंगी चादर चढ़ाना,  अच्छे नंबर से पास होने पर 5 किलो का प्रसाद चढ़ना , खुद का घर खरीदने पर मदिंर में बैठे भगवान जी को सोने के गहने से लाद देना इत्यादि ... यानी जितनी बड़ी मनोकामना  उतना भारी चढ़ावा ...





इन सब बातों से तो सही साबित होता है कि हम सभी अपने ईश्वर की पूजा डर से करते है ...जब हमें कुछ चाहिए होता है तब हमें उनकी याद आती है ...जबकि उनकी आराधना तो दिल से होती है बगैर किसी डर के ....क्योंकि साफ मन  से ही  हम उनसे जुड़ सकते है ...






 








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