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किसी को आदत बनाना गलत हैं या नहीं ?

 हम सभी की  ज़िंदगी में कई ऐसे लोग होते है ,जिनके साथ समय बिताना हमें बहुत अच्छा लगता हैं .और ऐसे लोग हमारी ज़िंदगी में कुछ ही लोग होते हैं.उदाहरण के तौर पर चाहे शॉपिंग पर जाना हो या किसी रेस्टोरेंट में खान हम हर किसी के भी साथ नहीं जाते.वो कुछ लोग ही होते हैं.और वो कुछ लोग कोई भी हो सकता हैं.हो सकता हैं कि वो आपका सबसे अच्छा दोस्त हो.आपका कोई कज़न हो, या आपके माता पिता . रोज़ की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में  सुकून के पल हम ऐसे ही किसी के साथ बिताते हैं.जो हफ्ते भर की चिंता में हमें सुकून पहुंचा सकें.देखा जाएं तो पूरे हफ्ते भर की टेंशन और भागदौड़ में हम ऐसे इंसान को चुनते हैं जो हमारे टेंशन को कम कर सके.  .और जब ये सिलसला चलता ही रहता हैं तो ये हमारी आदत बन जाता हैं.पर सवाल ये हैं कि जब वही इंसान जिसे हम अपना स्ट्रैस बस्टर (stress buster) समझते हैं यानी हमारी चिंता हरने वाला ,वही अगर हमसे पीछा छुड़ाने वाला बन जाएं तो,और देखा जाएं तो ऐसा दौर लगभग सबके जीवन में आता हैं.  और यहीं से हमारे दिमाग का कीमा बनता हैं. मतलब ये कि ,हम तो उसे अपनी आदत बना लेते हैं. पर वो आदत हमस...

देश की सेवा करने वालों को मिला 4 साल के लिए लॉलीपॉप

कहते हैं कि काम छोटा या बड़ा नहीं  होता हैं, हर काम की अहमियत होती हैं. टीचर, डॉक्टर ,मैकेनिक ,दर्जी, आया, आदि.जो भी व्यक्ति काम करता हैं उसकी अहमियत होती हैं. लेकिन शायद किसी पेश में मरना नहीं लिखा होता हैं. पर एक सिपाही ,एक आर्मी ऐसा पेशा है कि उसमें आपको अपनी जान भी समर्पित करनी होती हैं..... इसलिए इसमें हर कोई नहीं जाना चाहता ,और जो भी ये पेशा चुनता हैं तो समझ जाइएं कि उसका  जिगरा आपसे बड़ा हैं  जनाब. इसलिए जब कोई आर्मी में जाने का फैसला करता हैं तो वो अपना दिल,दिमाग और अपना शरीर पूरी तरह से समर्पित करता हैं.देखा जाएं तो ये सेना में जाने से पहले ही वीर हो जाते हैं, क्योंकि इन्होंने पहले से ही कुर्बान होने का निर्णय ले लिया है.  और यही कारण हैं कि उनके गुस्से से आज पूरा देश धदक रहा हैं. सरकार ने इन वीर जवानों को चार साल का लॉलीपॉप दिया हैं . चार साल के लिए ये अपना तन मन कुर्बान करें और फिर उसके बाद टाटा बाए-बाए. सरकार ने भी महंगा गिफ्ट दिया , एक तो कई साल से भर्तियां नहीं निकल रही थी. और अब निकली भी तो मात्र चार साल के लिए .वाह ! एक बार आप खुद सोचिए कि क्या सेना क...

इको फ्रैंडली पटाखे

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हर साल दीपावली के मौके पर हम सब से सुनते है कि इको फ्रैंडली दीपावली मनाईए,पटाखो का इस्तेमाल न करिए... पर देखा जाए तो ,बगैर पटाखो के दीपवली की रौनक थोड़ी फिकी लगती है...लेकिन इस रौनक से भी ज़्यादा ज़रुरी है ,अपने पर्यवरण की सुरक्षा... और इसलिए अगर हम कैमिकल वाले पटाखो के बजाए इको फ्रैंडली पटाखो को जलाए तो दीपावली की रौनक में चार-चॉंद लग जाएगा... और इसी बात को मैंंने एक विज्ञापन के ज़रिए समझाने का प्रयास किया है...जिसमें खुशी और सुरक्षा एक साथ है...    Listen to the most recent episode of my podcast: Eco friendly crakers   https://anchor.fm/nikita- prajapati/episodes/Eco- friendly-crakers-emq2oa Reply Forward

ये कल्चर है अपनी संस्कृति को भुलाना...

आज के इस दौर में अंग्रेज़ी भाषा कितनी महत्वपूर्ण है, ये हम सब बखूबी जानते है ...देश का आर्थिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक हर तरफ सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा का ही बोलबाला है ... और अब तो लोगों की ये मानसिकता भी बन गई कि इंग्लिश आती है तो भाई तुम पढ़े लिखे हो और समाज के ऊंचे तबके से तालुक रखते हो ... सच में हिंदी अपनी भाषा हो कर भी हमारी नहीं है ... और हिंदी को खुद से दूर करने का पूरा श्रेय हम सब देशवासियों को ही जाता है ...उसका साधी उदाहरण कई जगह देखने को मिलता है जैसे कि हमारे देश में ज़्यादातर दुकानों के नाम अंग्रेज़ी में लिखे होते है ...नौकरी के लिए साक्षात्कार (इंटरव्यू) भी अंग्रेज़ी भाषा में ही होता है जैसे किसी विदेशी कपंनी हो ...इसी के साथ ही हमारे देश के जितने भी चर्चित चेहरे है खासकर सिनेमा जगत के सितारे ये सब इंग्लिश में ही अपने इंटरव्यू देते है ...इतना ही नहीं हम दूर न जाकर खुद को ही देखे तो हम में से कुछ ही लोगों होगे जिन्हें हिंदी गिनती आती हो...यहां तक कि अगर चार लोगों के बीच अगर हम हिंदी के बजाए अंग्रेज़ी में बोलते है तो खुद पर गर्वान्वित महसूस करते है ... और देखा जाए तो ...

कारोना ने हम सबको क्या सिखाया...

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कोरोना ने हम सबको क्या सिखाया... कहते है कि बुरे के पीछे भी कुछ भला होता है .. कोरोना नाम की इस त्रासदी ने भी कुछ ऐसा ही किया है .. इस महामारी ने अच्छे अच्छों को सबक  सिखा दिया है .. तो वो अच्छे चमत्कार क्या हुए ज़रा डालते है एक नज़र- लोगो को अपनों से जोड़ा- अक्सर कर जब हम अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते है तो हम अपनों को भूल जाते है ...जब भी घरवाले बुलाते है हम कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देते है .. और अब देखिए इस कोरोना ने सबको अपने घर के रास्ते पहूंचा दिया... सभी को ज़िदगी जो प्यारी है... इस कोरोना ने घर  से रुठों को भी अपने असली घर का पता बता दिया जो वो खोए बैठे थे ...  पैसे नहीं खाने की कीमत का एहसास कराया- जैसे ही सर - कार ने यातायात के साधन और काम को ठप्प करवाया वैसे ही सभी को  इस बात का एहसास करा दिया गया कि भाई पैसों से हड़कर पेट होता है ..और जो भी काम के वजह से अपने गांवो को छोड़कर गए थे उन सबकों अपने गांव की ओर फिर लौटना पड़ा... और सभी ने हज़ारों किलोमीटर का फासला तय कर अपने गांव का रुख किया ...   अपने देश की कद्र करन...

क्या शादी के लिए समान जाति और धर्म ज़रुरी है ?

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क्या शादी के लिए समान जाति और धर्म  ज़रुरी  है  ?  भारत देश की जब भी बात आती है तो उसे एकता में विभिन्नता का देश माना जाता है  , क्योंकि यहां की बोली ,भाषा, धर्म  और मौसम हर चीज़ में विभिन्नता पाई जाती है ...लेकिन जब बात शादी की आए तो ये एकता कही खो जाती है ...और ऐसा इसलिए और होता है  क्योंकि हमारे देश में  विभिन्न प्रकार के धर्म के साथ ही अनेक तरह की जातियां भी है शामिल है ,जो लोगों को एक होने नहीं देती...                                          पर क्या सच में विवाह के लिए ये सब मायने रखता है ... मेरे ख्याल से नहीं, क्योंकि जो भी हो पर अन्त में हमारा व्यवहार ही मायने रखता है ...उदाहरण के तौर पर जब किसी की शादी होती है तो उसके कुछ दिन बात ही घरवालों के बीच अलगाव की रेखा खिंच जाती है ... और सच यही है कि आपका अपना स्वभाव ही महत्तवपूर्ण होता है ...  देखा जाए तो भारत देश में इसी वजह से कई युवा आत्महत्या या घर से भाग जाने का र...

एक बाज़ार ऐसा जहां बिकती है दुल्हने

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एक बाज़ार ऐसा जहां बिकती है दुल्हने .... दुनिया  के हर माता -पिता का सपना होता है अपने बच्चों की शादी करना ...और वही  अगर बेटी की शादी की बात हो तो वो और भी महत्तवपुर्ण हो जाती है ... लेकिन आपको ये जानकर काफी हैरानी होगी कि  बुल्गारिया देश में एक ऐसा भी समाज है जहां लड़कियों की शादी करने के लिए पहले उन्हें बेचा जाता है...  दरअसल बुल्गारिया देश में एक रोमा नाम का सामाज हैं, जिसमें कालदाज़ी नाम की एक पिछड़ी जाती है....पेशे से इस जाति के लोग लौहार का काम करते है ...और इनकी आर्थिक स्थिति भी इतनी अच्छी  नहीं होती हैं....और इसलिए इनके यहां शादी एक आर्थिक रुप से  लाभान्वित माना जाता हैं ... इस जाति में लड़कियों की शादी के लिए उन्हें सबसे पहले दुल्हन बाज़ार में बेचा जाता है ...और इस बाज़ार का आयोजन हर चार साल में किया जाता है ... इस बाज़ार मे ंकुवांरी लड़किया हिस्सा लेती है ,जिनकी उम्र 16 या उससे अधिक होती है ... वैसे ज़्यादातर लोग कम उम्र की ही लड़कियों को खरीदते है ... इस रुढ़ीवाद ईसाई समाज मे ंलड़कियों को  ज़्यादा पढ़ने की इजा...