Posts

खुद की जिंदगी को औरों से तुलना करना किसी ज़हर से कम नहीं

 हम सब अपनी जिंदगी में कई सारे सपने और चाहतों के साथ जीते है.आने वाले दिन में हम ऐसे होंगे यहां जाएंगे दुनिया घुमेगे ,बड़ी कारे ,खुद का घर  एक बेहतर पार्टनर . लेकिन आमतौर पर  ये सपने हमारे दिमाग बनते है दूसरों को देखकर .जबकि गौर करने वाली बात ये है कि हम सबकी  जिंदगी हर व्यकति से अलग होती है . हमारी फैमली , आर्थिक स्थिति , घर के लोगो की सोच ,हर चीज़. पर फिर भी हम अपने आस पास के लोगों से खुद की ज़िंदगी की तुलना करने लगते है कि इसके पास ये है पर मेरे पास नहीं . यही  से शुरूआत होती है निराशा कि या यूं कहे कि एक ऐसा  slow poison जो हमारी खुशी को धीरे धीरे खत्म करने लगता है .  किसी से प्रेरित हो कर कुछ हासिल करना अलग बात हैं पर किसी की खुशियों या  achivements को देखकर खुद की स्थिति पर निराश होना या सरल शब्दों में कहे कि कुढ़ना ये एक ऐसे खराब दही के समान है जो जमने के बाद कसैला होता है जिसे सिर्फ फेका ही जाता है .   आमतौर पर ये पड़ाव अमूमन हर किसी के जीवन में आता है . लेकिन इससे हमेशआ सावाधान रहे .क्योंकि ये हमारी छोटी छोटी खुशियों को ऐसे खा ज...

यहां आकर खत्म होती है जात और धर्म

किसी भी व्यक्ति की जात और धर्म उसकी पहचान का एक अहम हिस्सा है . कही एडमिशन लेना हो या नौकरी के लिए कोई फॉर्म भरना हो . जात और धर्म ज़रूर पूछा जाता है .जात और धर्म के आधार पर आरक्षण भी मिलते है. देखा जाए तो जात और धर्म को हर जगह मना जाता है . शादी के लिए भी इसको सबसे पहले रखा जाता है .यदि समान जात और धर्म में शादी न हुई तो इस शान के खिलाफ माना जाता है . इतना ही नहीं इस वजह से कितनों लोगों को मौत को घाट भी उतार दिया है . कुल मिला कर लोग जात और धर्म से किसी भी हाल में समझौता नहीं कर सकते .इस तरह की समझदारी बरसों से चली आ रही है .जो लोग खुद को ऊंची जात का मानते है  वो किसी अन्य  जात के द्वारा दिया हुआ पानी नहीं पी सकते , और वो इसलिए क्योंकि वह उस व्यक्ति को वो नीच मानते है यहा्ं तक कि उसके घर जा कर खा भी नहीं सकते .क्योंकि उसे अछूत मानते है. पुराने समय में तो मंदिर तक अलग थे.जबकि स्वयं भगवान तक ऐसे ऊंच नीच हो नहीं मानते लेकिन समाज में लोगों ने खुद के ऐसे नियम बना डाले की अगर भगवान खुद देखे तो उन्हें हंसी आए .  खैर एक जगह है जहां हर व्यक्ति  शुद्र,दलित ,क्षत्रिय, ब्राह्मण...

हम सब डरते है अनजाने हमसफर

हम सब शादी करने से घबरराते है । हमे डर लगा रहता है कि कही हमारा partner हमारे जैसा न हुआ तो !!!  अगर वो हमे न समझे तो !!! ऐसे कई सारे सवाल हमारे दिमाग में बवंडर ला देते है । 

एक खत शाहरूख के हेटर्स के नाम !!!!

 प्रिय हेटर्स, भले ही आप शाहरूख खान को नापसंद करते हो लेकिन हम जो शाहरूख को चाहते है मानते हमारे लिए आपकी  ये जो नफरत है शाहरूख के प्रित उससे फर्क नहीं पड़ता ...  सच कहूं तो शाहरूख को चाहना लाईफ की सबसे बड़ी कमयाबी लगती है , कभी कभी ये लगता है कि अगर  मैंने शाहरूख को ना चाहा होता तो बहुत बड़े और प्यारे एहसास से दूर रहता ...  शाहरूख की मुस्कान , वो दिल और दिमाग में बसने वाली आवाज़, और उनकी हाज़िर जवाबी ,हर चीज़ खास है . वो जहां जाते है ऐसा लगता है कि उनके साथ ही पूरी दुनिया रहती है .. इस बात का सबसे बड़ा सबूत ये है कि इतने साल बाद उनकी एक भी फिल्म न आने के बावजूद वो आए दिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते रहते है . वही आपकी नफरत हमेशा से बॉयकॉट के रूप में आती है .MY NAME IS KHAN  के बॉयकॉट से लेकर पठान के बॉयकट तक हम हमेशा किंग खान के साथ है और रहेंगे . बॉयकाट जैसा शब्द शाहरूख के सामने काफी छोटा है . आप अपनी नफरत से उसे और सींचो. आपकी नफरत का  RANGE  बहुत कम है हमारे प्यार के आगे ...  हम शाहरूख को सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर ही नहीं मानते बल्कि हम उन...

हिंदू मुस्लिम हैं तो मुद्दा भड़केगा !!!!

 हाल ही में उत्तराखंड में अंकिता हत्या कांड ने सभी को हिला कर रख दिया है.साथ ही देश को एक नया मुद्दा भी मिल गया है. लेकिन देखा जाए तो ये घटना और भी तूल पकड़ती अगर इसमें किसी मुस्लिम का नाम शामिल होता.  इस वक्त देश में सबसे ट्रैंडिंग विषय  है हिंदू -मुस्लिम ... खैर देश में दंगा भड़काने वालों के लिए इस केस में कुछ नहीं मिला .. नहीं तो अब तक जगह जगह अंकिता को इंसाफ दो, का शोर और भी तेजी के साथ होता . हर घटना को अब हम सही और गलत की दृष्टि से तो देखते ही नहीं है. हमारी आंखों पर तो सिर्फ धर्म को बचाने की नकली पट्टी बंधी हुई हैं.इसी को लगा कर हम हर मुद्दे को देखते है .जबकि देखा  जाए तो हम सही ढंग से अपने धर्म के हिसाब से भी नहीं चलते .इस धर्म की आंधी ने एक नया मुद्दा दिया है और वो ये है कि हमें  अपना धर्म खतरे में दिख रहा है. जबकि ऐसा कुछ है ही नही.  देखा जाएं तो दंगे की आड़ में जो अपने मुनाफे की रोटियां सेंक रहे है , वो हमारे दिमाग और सोच को चला रहे है. जिस वह से  हम हिंदू और मुस्लिम की बात पर फौरन आग बबूला हो जाते है.  "मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रख...

कुछ करना है तो मेहमान बनो

घर का सबसे खास मेहमान कौन होता है ? ये प्रश्न सुनते ही आपके दिमाग में जिन लोगों का नाम आया होगा .उसकी जगह आप अपना ही नाम लीजिए.क्योंकि घर के सबसे खास मेहमान तो हम ही होते हैं. जिसके आने से  हमारे माता पिता के चेहरे खिल जाते है.सालों या महीनों से भले ही घर में अच्छी चीज़ न बनी हो ,पर हमारे आते ही हमारी मां किचन में वो सब बनाने लगती हैं जो हमें पसंद हो .   ऐसे  मेेहमानो के आने पर रौनक आमतौर पर बड़े त्यौहारों पर देखने को मिलती है. गांव की ओर जाने वाली बसों में  ऐसे ही खास मेहमान बैठे होते है ,जिनके आते ही घर की रौनक दोगुनी हो जाती है. भले ही वो रौनक दो चार दिन की ही क्यों न हो.देखा जाए तो अपने ही घर में मेहमान हम खुद ही बनते हैं.और ये रास्ता हम खुद ही चुनते है .पर क्यों ? इसका  जवाब है एक बेहतर  जिंदगी के लिए .अच्छी पढ़ाई ,अधिक पैसे वाली नौकरी के लिए. पर इसके लिए जो कीमत चुकानी होती है वो बहुत ही बड़ी होती है .  वैसे देखा जाए तो ऐसे खास मेहमान के आने और घर में रूकने के दिन भी वक्त के साथ बदलते है.उदाहरण के तौर पर जब कॉलेज का पहला -दूसरा साल होता है त...

किसी को आदत बनाना गलत हैं या नहीं ?

 हम सभी की  ज़िंदगी में कई ऐसे लोग होते है ,जिनके साथ समय बिताना हमें बहुत अच्छा लगता हैं .और ऐसे लोग हमारी ज़िंदगी में कुछ ही लोग होते हैं.उदाहरण के तौर पर चाहे शॉपिंग पर जाना हो या किसी रेस्टोरेंट में खान हम हर किसी के भी साथ नहीं जाते.वो कुछ लोग ही होते हैं.और वो कुछ लोग कोई भी हो सकता हैं.हो सकता हैं कि वो आपका सबसे अच्छा दोस्त हो.आपका कोई कज़न हो, या आपके माता पिता . रोज़ की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में  सुकून के पल हम ऐसे ही किसी के साथ बिताते हैं.जो हफ्ते भर की चिंता में हमें सुकून पहुंचा सकें.देखा जाएं तो पूरे हफ्ते भर की टेंशन और भागदौड़ में हम ऐसे इंसान को चुनते हैं जो हमारे टेंशन को कम कर सके.  .और जब ये सिलसला चलता ही रहता हैं तो ये हमारी आदत बन जाता हैं.पर सवाल ये हैं कि जब वही इंसान जिसे हम अपना स्ट्रैस बस्टर (stress buster) समझते हैं यानी हमारी चिंता हरने वाला ,वही अगर हमसे पीछा छुड़ाने वाला बन जाएं तो,और देखा जाएं तो ऐसा दौर लगभग सबके जीवन में आता हैं.  और यहीं से हमारे दिमाग का कीमा बनता हैं. मतलब ये कि ,हम तो उसे अपनी आदत बना लेते हैं. पर वो आदत हमस...