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ज़माना है fakism का तो ज़रा दिल और दिमाग से काम करें

 किसी ने खूब कहा है कि नकली लोग (fake people)  से बच कर रहना चाहिए.क्योंकि ऐसे प्राणी आपका इस्तेमाल करेंगे और उसके बाद ज़रूरत पूरी होने पर ये आपको एक warpper की तरह फेंक देंगे .  देखा जाए तो ऐसे लोग आपको हर जगह मिलेगे, घर,दफ्तर स्ंकूल-कॉलेज . वैसे खैर इसे पढ़ कर आपको भी कोई न कोई ऐसा याद आ ही गया होगा ,जिसने आपको भी एक  warpper की तरह  use किया हो .  साथ ही आप अगर दिमाग के घोड़े दौढ़ाए तो शायद आप पाएगे कि  कही न कही हमने भी  किया हो .  बरहाल ये भी हो सकता है कि आप इस सूची (list) में न हो .ये सबकी अपनी नियत पर निर्भर करता है.वैसे देखा जाए तो कभी न कभी हम  किसी का ज़रा सा  इस्तेमाल करते है या फिर यूं कहे कि किसी का बिन बुरा किए या उसे तकळीफ दिए बिना इस्तेमाल करना . कम्पयुटर की भाषा में इसे (white hackers) कहते है .जिसमें किसी का नुकसान न हो .  वही black hackers वो होते है जो बस अपना फायदा ही देखते है . ऐसे लोग आपके करीब इसलिए ही जाएगे क्योंकि उन्हें आपसे कुछ न कुछ फायदा होगा पर सबसे खास बात ये है कि ये आपके  feelings की ज़रा...

खुद की जिंदगी को औरों से तुलना करना किसी ज़हर से कम नहीं

 हम सब अपनी जिंदगी में कई सारे सपने और चाहतों के साथ जीते है.आने वाले दिन में हम ऐसे होंगे यहां जाएंगे दुनिया घुमेगे ,बड़ी कारे ,खुद का घर  एक बेहतर पार्टनर . लेकिन आमतौर पर  ये सपने हमारे दिमाग बनते है दूसरों को देखकर .जबकि गौर करने वाली बात ये है कि हम सबकी  जिंदगी हर व्यकति से अलग होती है . हमारी फैमली , आर्थिक स्थिति , घर के लोगो की सोच ,हर चीज़. पर फिर भी हम अपने आस पास के लोगों से खुद की ज़िंदगी की तुलना करने लगते है कि इसके पास ये है पर मेरे पास नहीं . यही  से शुरूआत होती है निराशा कि या यूं कहे कि एक ऐसा  slow poison जो हमारी खुशी को धीरे धीरे खत्म करने लगता है .  किसी से प्रेरित हो कर कुछ हासिल करना अलग बात हैं पर किसी की खुशियों या  achivements को देखकर खुद की स्थिति पर निराश होना या सरल शब्दों में कहे कि कुढ़ना ये एक ऐसे खराब दही के समान है जो जमने के बाद कसैला होता है जिसे सिर्फ फेका ही जाता है .   आमतौर पर ये पड़ाव अमूमन हर किसी के जीवन में आता है . लेकिन इससे हमेशआ सावाधान रहे .क्योंकि ये हमारी छोटी छोटी खुशियों को ऐसे खा ज...

यहां आकर खत्म होती है जात और धर्म

किसी भी व्यक्ति की जात और धर्म उसकी पहचान का एक अहम हिस्सा है . कही एडमिशन लेना हो या नौकरी के लिए कोई फॉर्म भरना हो . जात और धर्म ज़रूर पूछा जाता है .जात और धर्म के आधार पर आरक्षण भी मिलते है. देखा जाए तो जात और धर्म को हर जगह मना जाता है . शादी के लिए भी इसको सबसे पहले रखा जाता है .यदि समान जात और धर्म में शादी न हुई तो इस शान के खिलाफ माना जाता है . इतना ही नहीं इस वजह से कितनों लोगों को मौत को घाट भी उतार दिया है . कुल मिला कर लोग जात और धर्म से किसी भी हाल में समझौता नहीं कर सकते .इस तरह की समझदारी बरसों से चली आ रही है .जो लोग खुद को ऊंची जात का मानते है  वो किसी अन्य  जात के द्वारा दिया हुआ पानी नहीं पी सकते , और वो इसलिए क्योंकि वह उस व्यक्ति को वो नीच मानते है यहा्ं तक कि उसके घर जा कर खा भी नहीं सकते .क्योंकि उसे अछूत मानते है. पुराने समय में तो मंदिर तक अलग थे.जबकि स्वयं भगवान तक ऐसे ऊंच नीच हो नहीं मानते लेकिन समाज में लोगों ने खुद के ऐसे नियम बना डाले की अगर भगवान खुद देखे तो उन्हें हंसी आए .  खैर एक जगह है जहां हर व्यक्ति  शुद्र,दलित ,क्षत्रिय, ब्राह्मण...

हम सब डरते है अनजाने हमसफर

हम सब शादी करने से घबरराते है । हमे डर लगा रहता है कि कही हमारा partner हमारे जैसा न हुआ तो !!!  अगर वो हमे न समझे तो !!! ऐसे कई सारे सवाल हमारे दिमाग में बवंडर ला देते है । 

एक खत शाहरूख के हेटर्स के नाम !!!!

 प्रिय हेटर्स, भले ही आप शाहरूख खान को नापसंद करते हो लेकिन हम जो शाहरूख को चाहते है मानते हमारे लिए आपकी  ये जो नफरत है शाहरूख के प्रित उससे फर्क नहीं पड़ता ...  सच कहूं तो शाहरूख को चाहना लाईफ की सबसे बड़ी कमयाबी लगती है , कभी कभी ये लगता है कि अगर  मैंने शाहरूख को ना चाहा होता तो बहुत बड़े और प्यारे एहसास से दूर रहता ...  शाहरूख की मुस्कान , वो दिल और दिमाग में बसने वाली आवाज़, और उनकी हाज़िर जवाबी ,हर चीज़ खास है . वो जहां जाते है ऐसा लगता है कि उनके साथ ही पूरी दुनिया रहती है .. इस बात का सबसे बड़ा सबूत ये है कि इतने साल बाद उनकी एक भी फिल्म न आने के बावजूद वो आए दिन सोशल मीडिया पर ट्रेंड करते रहते है . वही आपकी नफरत हमेशा से बॉयकॉट के रूप में आती है .MY NAME IS KHAN  के बॉयकॉट से लेकर पठान के बॉयकट तक हम हमेशा किंग खान के साथ है और रहेंगे . बॉयकाट जैसा शब्द शाहरूख के सामने काफी छोटा है . आप अपनी नफरत से उसे और सींचो. आपकी नफरत का  RANGE  बहुत कम है हमारे प्यार के आगे ...  हम शाहरूख को सिर्फ एक अभिनेता के तौर पर ही नहीं मानते बल्कि हम उन...

हिंदू मुस्लिम हैं तो मुद्दा भड़केगा !!!!

 हाल ही में उत्तराखंड में अंकिता हत्या कांड ने सभी को हिला कर रख दिया है.साथ ही देश को एक नया मुद्दा भी मिल गया है. लेकिन देखा जाए तो ये घटना और भी तूल पकड़ती अगर इसमें किसी मुस्लिम का नाम शामिल होता.  इस वक्त देश में सबसे ट्रैंडिंग विषय  है हिंदू -मुस्लिम ... खैर देश में दंगा भड़काने वालों के लिए इस केस में कुछ नहीं मिला .. नहीं तो अब तक जगह जगह अंकिता को इंसाफ दो, का शोर और भी तेजी के साथ होता . हर घटना को अब हम सही और गलत की दृष्टि से तो देखते ही नहीं है. हमारी आंखों पर तो सिर्फ धर्म को बचाने की नकली पट्टी बंधी हुई हैं.इसी को लगा कर हम हर मुद्दे को देखते है .जबकि देखा  जाए तो हम सही ढंग से अपने धर्म के हिसाब से भी नहीं चलते .इस धर्म की आंधी ने एक नया मुद्दा दिया है और वो ये है कि हमें  अपना धर्म खतरे में दिख रहा है. जबकि ऐसा कुछ है ही नही.  देखा जाएं तो दंगे की आड़ में जो अपने मुनाफे की रोटियां सेंक रहे है , वो हमारे दिमाग और सोच को चला रहे है. जिस वह से  हम हिंदू और मुस्लिम की बात पर फौरन आग बबूला हो जाते है.  "मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रख...

कुछ करना है तो मेहमान बनो

घर का सबसे खास मेहमान कौन होता है ? ये प्रश्न सुनते ही आपके दिमाग में जिन लोगों का नाम आया होगा .उसकी जगह आप अपना ही नाम लीजिए.क्योंकि घर के सबसे खास मेहमान तो हम ही होते हैं. जिसके आने से  हमारे माता पिता के चेहरे खिल जाते है.सालों या महीनों से भले ही घर में अच्छी चीज़ न बनी हो ,पर हमारे आते ही हमारी मां किचन में वो सब बनाने लगती हैं जो हमें पसंद हो .   ऐसे  मेेहमानो के आने पर रौनक आमतौर पर बड़े त्यौहारों पर देखने को मिलती है. गांव की ओर जाने वाली बसों में  ऐसे ही खास मेहमान बैठे होते है ,जिनके आते ही घर की रौनक दोगुनी हो जाती है. भले ही वो रौनक दो चार दिन की ही क्यों न हो.देखा जाए तो अपने ही घर में मेहमान हम खुद ही बनते हैं.और ये रास्ता हम खुद ही चुनते है .पर क्यों ? इसका  जवाब है एक बेहतर  जिंदगी के लिए .अच्छी पढ़ाई ,अधिक पैसे वाली नौकरी के लिए. पर इसके लिए जो कीमत चुकानी होती है वो बहुत ही बड़ी होती है .  वैसे देखा जाए तो ऐसे खास मेहमान के आने और घर में रूकने के दिन भी वक्त के साथ बदलते है.उदाहरण के तौर पर जब कॉलेज का पहला -दूसरा साल होता है त...

किसी को आदत बनाना गलत हैं या नहीं ?

 हम सभी की  ज़िंदगी में कई ऐसे लोग होते है ,जिनके साथ समय बिताना हमें बहुत अच्छा लगता हैं .और ऐसे लोग हमारी ज़िंदगी में कुछ ही लोग होते हैं.उदाहरण के तौर पर चाहे शॉपिंग पर जाना हो या किसी रेस्टोरेंट में खान हम हर किसी के भी साथ नहीं जाते.वो कुछ लोग ही होते हैं.और वो कुछ लोग कोई भी हो सकता हैं.हो सकता हैं कि वो आपका सबसे अच्छा दोस्त हो.आपका कोई कज़न हो, या आपके माता पिता . रोज़ की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में  सुकून के पल हम ऐसे ही किसी के साथ बिताते हैं.जो हफ्ते भर की चिंता में हमें सुकून पहुंचा सकें.देखा जाएं तो पूरे हफ्ते भर की टेंशन और भागदौड़ में हम ऐसे इंसान को चुनते हैं जो हमारे टेंशन को कम कर सके.  .और जब ये सिलसला चलता ही रहता हैं तो ये हमारी आदत बन जाता हैं.पर सवाल ये हैं कि जब वही इंसान जिसे हम अपना स्ट्रैस बस्टर (stress buster) समझते हैं यानी हमारी चिंता हरने वाला ,वही अगर हमसे पीछा छुड़ाने वाला बन जाएं तो,और देखा जाएं तो ऐसा दौर लगभग सबके जीवन में आता हैं.  और यहीं से हमारे दिमाग का कीमा बनता हैं. मतलब ये कि ,हम तो उसे अपनी आदत बना लेते हैं. पर वो आदत हमस...

देश की सेवा करने वालों को मिला 4 साल के लिए लॉलीपॉप

कहते हैं कि काम छोटा या बड़ा नहीं  होता हैं, हर काम की अहमियत होती हैं. टीचर, डॉक्टर ,मैकेनिक ,दर्जी, आया, आदि.जो भी व्यक्ति काम करता हैं उसकी अहमियत होती हैं. लेकिन शायद किसी पेश में मरना नहीं लिखा होता हैं. पर एक सिपाही ,एक आर्मी ऐसा पेशा है कि उसमें आपको अपनी जान भी समर्पित करनी होती हैं..... इसलिए इसमें हर कोई नहीं जाना चाहता ,और जो भी ये पेशा चुनता हैं तो समझ जाइएं कि उसका  जिगरा आपसे बड़ा हैं  जनाब. इसलिए जब कोई आर्मी में जाने का फैसला करता हैं तो वो अपना दिल,दिमाग और अपना शरीर पूरी तरह से समर्पित करता हैं.देखा जाएं तो ये सेना में जाने से पहले ही वीर हो जाते हैं, क्योंकि इन्होंने पहले से ही कुर्बान होने का निर्णय ले लिया है.  और यही कारण हैं कि उनके गुस्से से आज पूरा देश धदक रहा हैं. सरकार ने इन वीर जवानों को चार साल का लॉलीपॉप दिया हैं . चार साल के लिए ये अपना तन मन कुर्बान करें और फिर उसके बाद टाटा बाए-बाए. सरकार ने भी महंगा गिफ्ट दिया , एक तो कई साल से भर्तियां नहीं निकल रही थी. और अब निकली भी तो मात्र चार साल के लिए .वाह ! एक बार आप खुद सोचिए कि क्या सेना क...

इको फ्रैंडली पटाखे

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हर साल दीपावली के मौके पर हम सब से सुनते है कि इको फ्रैंडली दीपावली मनाईए,पटाखो का इस्तेमाल न करिए... पर देखा जाए तो ,बगैर पटाखो के दीपवली की रौनक थोड़ी फिकी लगती है...लेकिन इस रौनक से भी ज़्यादा ज़रुरी है ,अपने पर्यवरण की सुरक्षा... और इसलिए अगर हम कैमिकल वाले पटाखो के बजाए इको फ्रैंडली पटाखो को जलाए तो दीपावली की रौनक में चार-चॉंद लग जाएगा... और इसी बात को मैंंने एक विज्ञापन के ज़रिए समझाने का प्रयास किया है...जिसमें खुशी और सुरक्षा एक साथ है...    Listen to the most recent episode of my podcast: Eco friendly crakers   https://anchor.fm/nikita- prajapati/episodes/Eco- friendly-crakers-emq2oa Reply Forward

ये कल्चर है अपनी संस्कृति को भुलाना...

आज के इस दौर में अंग्रेज़ी भाषा कितनी महत्वपूर्ण है, ये हम सब बखूबी जानते है ...देश का आर्थिक क्षेत्र हो या फिर सामाजिक हर तरफ सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा का ही बोलबाला है ... और अब तो लोगों की ये मानसिकता भी बन गई कि इंग्लिश आती है तो भाई तुम पढ़े लिखे हो और समाज के ऊंचे तबके से तालुक रखते हो ... सच में हिंदी अपनी भाषा हो कर भी हमारी नहीं है ... और हिंदी को खुद से दूर करने का पूरा श्रेय हम सब देशवासियों को ही जाता है ...उसका साधी उदाहरण कई जगह देखने को मिलता है जैसे कि हमारे देश में ज़्यादातर दुकानों के नाम अंग्रेज़ी में लिखे होते है ...नौकरी के लिए साक्षात्कार (इंटरव्यू) भी अंग्रेज़ी भाषा में ही होता है जैसे किसी विदेशी कपंनी हो ...इसी के साथ ही हमारे देश के जितने भी चर्चित चेहरे है खासकर सिनेमा जगत के सितारे ये सब इंग्लिश में ही अपने इंटरव्यू देते है ...इतना ही नहीं हम दूर न जाकर खुद को ही देखे तो हम में से कुछ ही लोगों होगे जिन्हें हिंदी गिनती आती हो...यहां तक कि अगर चार लोगों के बीच अगर हम हिंदी के बजाए अंग्रेज़ी में बोलते है तो खुद पर गर्वान्वित महसूस करते है ... और देखा जाए तो ...

कारोना ने हम सबको क्या सिखाया...

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कोरोना ने हम सबको क्या सिखाया... कहते है कि बुरे के पीछे भी कुछ भला होता है .. कोरोना नाम की इस त्रासदी ने भी कुछ ऐसा ही किया है .. इस महामारी ने अच्छे अच्छों को सबक  सिखा दिया है .. तो वो अच्छे चमत्कार क्या हुए ज़रा डालते है एक नज़र- लोगो को अपनों से जोड़ा- अक्सर कर जब हम अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हो जाते है तो हम अपनों को भूल जाते है ...जब भी घरवाले बुलाते है हम कोई न कोई बहाना बनाकर टाल देते है .. और अब देखिए इस कोरोना ने सबको अपने घर के रास्ते पहूंचा दिया... सभी को ज़िदगी जो प्यारी है... इस कोरोना ने घर  से रुठों को भी अपने असली घर का पता बता दिया जो वो खोए बैठे थे ...  पैसे नहीं खाने की कीमत का एहसास कराया- जैसे ही सर - कार ने यातायात के साधन और काम को ठप्प करवाया वैसे ही सभी को  इस बात का एहसास करा दिया गया कि भाई पैसों से हड़कर पेट होता है ..और जो भी काम के वजह से अपने गांवो को छोड़कर गए थे उन सबकों अपने गांव की ओर फिर लौटना पड़ा... और सभी ने हज़ारों किलोमीटर का फासला तय कर अपने गांव का रुख किया ...   अपने देश की कद्र करन...

क्या शादी के लिए समान जाति और धर्म ज़रुरी है ?

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क्या शादी के लिए समान जाति और धर्म  ज़रुरी  है  ?  भारत देश की जब भी बात आती है तो उसे एकता में विभिन्नता का देश माना जाता है  , क्योंकि यहां की बोली ,भाषा, धर्म  और मौसम हर चीज़ में विभिन्नता पाई जाती है ...लेकिन जब बात शादी की आए तो ये एकता कही खो जाती है ...और ऐसा इसलिए और होता है  क्योंकि हमारे देश में  विभिन्न प्रकार के धर्म के साथ ही अनेक तरह की जातियां भी है शामिल है ,जो लोगों को एक होने नहीं देती...                                          पर क्या सच में विवाह के लिए ये सब मायने रखता है ... मेरे ख्याल से नहीं, क्योंकि जो भी हो पर अन्त में हमारा व्यवहार ही मायने रखता है ...उदाहरण के तौर पर जब किसी की शादी होती है तो उसके कुछ दिन बात ही घरवालों के बीच अलगाव की रेखा खिंच जाती है ... और सच यही है कि आपका अपना स्वभाव ही महत्तवपूर्ण होता है ...  देखा जाए तो भारत देश में इसी वजह से कई युवा आत्महत्या या घर से भाग जाने का र...

एक बाज़ार ऐसा जहां बिकती है दुल्हने

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एक बाज़ार ऐसा जहां बिकती है दुल्हने .... दुनिया  के हर माता -पिता का सपना होता है अपने बच्चों की शादी करना ...और वही  अगर बेटी की शादी की बात हो तो वो और भी महत्तवपुर्ण हो जाती है ... लेकिन आपको ये जानकर काफी हैरानी होगी कि  बुल्गारिया देश में एक ऐसा भी समाज है जहां लड़कियों की शादी करने के लिए पहले उन्हें बेचा जाता है...  दरअसल बुल्गारिया देश में एक रोमा नाम का सामाज हैं, जिसमें कालदाज़ी नाम की एक पिछड़ी जाती है....पेशे से इस जाति के लोग लौहार का काम करते है ...और इनकी आर्थिक स्थिति भी इतनी अच्छी  नहीं होती हैं....और इसलिए इनके यहां शादी एक आर्थिक रुप से  लाभान्वित माना जाता हैं ... इस जाति में लड़कियों की शादी के लिए उन्हें सबसे पहले दुल्हन बाज़ार में बेचा जाता है ...और इस बाज़ार का आयोजन हर चार साल में किया जाता है ... इस बाज़ार मे ंकुवांरी लड़किया हिस्सा लेती है ,जिनकी उम्र 16 या उससे अधिक होती है ... वैसे ज़्यादातर लोग कम उम्र की ही लड़कियों को खरीदते है ... इस रुढ़ीवाद ईसाई समाज मे ंलड़कियों को  ज़्यादा पढ़ने की इजा...

भक्ति में डर का एहसास

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    भक्ति में डर का एहसास ..... कभी कभी मैं सोचती हूं की   हम अपने भगवान या अल्लाह की पूजा कैसे करते है, डर से या मन से .... अगर ये सवाल मैं किसी से पूछू तो ज्यादातर लोग   यही कहेगे कि हम तो मन से करते है... पर देखा जाए तो उनकी ये आराधना डर से ही होगी ... बहरहाल ,अल्लाह का शुक्रियाअदा करने के लिए खौफ की ज़रुरत नहीं होती उसी तरह   व्रत भी डर के साथ नही अपनी इच्छा के साथ रखना चाहिए... और ये डर किसी और ने नहीं हम सब ने ही इसे बढ़ावा दिया है ,उदाहरण के तौर पर - जब कुछ बुरा होता  है   तो हम कहते है कि भगवान की मर्ज़ी होगी और अगर कुछ अच्छा हो तो उसे भगवान  का चमत्कार कहते है .... यानी हमारे जीवन में जब भी  कुछ   घटित होता है उसका ज़िम्मेदार हम ईश्वर को ही मानते है  , पर देखा जाए तो  इन सबके पीछे   हमारे कर्म भी ज़िम्मेदार होते है ...और ये हम सभी के धर्म ग्रंधों में भी लिखा है कि ईश्वर कभी हमें ये नहीं कहते उन्हें बिना मन के या ज़बरदस्ती याद किया जाए.. और यही नहीं   ...

हम नहीं सुधरेगे

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     https://youtu.be/wvCPmJVN6no इन दिनों हमारे देश में  सफाई  को लेकर कई कदम उठाए जा रहें है... शहरों से लेकर गांव  तक कई तरह के जागरुकता अभियान  भी चलाए रहे है ... और  इस सफाई अभियान में एक कदम है खुले में शौच , और  इसके लिए तो सरकार ने भी शौचालय की व्सवसथा की है ...पर हमारे देश के कुछ बुद्धिजीवी लोगों को ये बात समझ में नहीं आती...  और वो महान व्यकित है  जो कही भी हल्के जो जाते है ... जिन्हे सार्वजनिक शौचालय के बजाए रोड़ ,गलियां या कोई कोना ज़रुर दिख जाता है टॉयलट  करने के लिए ....  यानी दो रुपए खर्च ना करना पड़े , बस ...और रही बात शर्म की, तो  इससे इनका दूर -दूर तक कोई नाता नहीं है ... और ऐसा नही है कि ये हरकत सिर्फ अनपड़ ही करते है , ब्लकि एक से एक  पडेे़ लिखे लोग भी  बड़ी आसानी से हल्के हो जाते है ...  बहरहाल  इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता , पर जो भी ऐसी जगह से होकर गुज़रता है उसे बेहद गंदी बदबू का सामना करना पड़ता है ... मतलब ये तो वही हो गया कि  करे कोई और भुगते कोई और.... ...

सिनेमा में मोहब्बत का बदलता रंग.....

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सिनेमा में मोहब्बत का बदलता रंग.....        यूं तो भारतीय सिनेमा में हमें इमोशन के हर पहलू देखने को मिलते है , मैलो ड्रामा से लेकर प्यार ,दोस्ती और चोर पुलिस की भागा- दौड़ी तक...और यहां तक की अब तो हम फिक्शन से अलग बायोपिक पर भी आ गए है ... और सिनेमा प्रेमियों ने फिल्मों के इस बदलते रंग को अपनाया भी हैं ...पर अगर हम लवस्टोरी की बात करें तो मुझे मोहब्बत का ये बदला हुआ रंग कुछ हज़म नहीं हुआ... अगर मैं पहले और अब के दौर की बात करुं तो , पहले  की फिल्मों में ,प्यार एक ज्ज़बात हुआ करता था.. वही अब का प्यार केवल दिखावा है या फिर यूं कहे की   अब की फिल्मों में मोहब्बत को सिर्फ शारीरिक सबंध के ज़रिए ही पेश किया जाता है ... देखा जाए तो अब की फिल्मों में प्यार को  बगैर इनटेमेट सीन के दिखाया ही नहीं जाता ... फिल्मस् के मेकर्स को लगता है कि आज की जनता बस यही देखना चाहती है... और इसीलिए आज की पीढ़ी में भी मोहब्बत का वही नया रंग घुलता दिख रहा है... पर मेरा मानना है कि  , फिल्म में कहानी  नाम की भी कोई चीज़ होती है ...इंटेमे...